Monthly Archives: November 2016

बारिश


      बारिश वाली रात

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                   रवि को फिर वहीं रात याद आ गयी , मूसलाधार बरसात हो रही थी और साँझ ने यह कहते हुए “आओ , मेरे पास । बहुत भीग गये हो कुछ ताप दूँ तुमको । उसे अपनी कोख में छिपा लिया था और रवि जिसकी सर्दी से हृदय धड़कन बढ़ गई थी यह कहते हुए , साँझ ! मुझे दुपका लो अपने हृदयतल में। साँझ में समा गया था । अंग से अंग सटाये दोनों को आभास न हुआ कब रात हुई और कब सुबह । 
    सूर्य आकाश में अपनी रश्मियों के साथ चमक रहा था वहीं किरणें उन दोनों पर पड़ रही थी ।
 साँझ ने झकझोरते हुए कहा , ” रवि , उठो । माँ याद कर रही होंगी , उठो और जाओ घर । 
       रवि चलता गया , कदम बढाने के साथ -साथ साँझ के साथ बिताए पल भी आगे ही आगे बढ़ते जा  रहे थे ।
       जवानी भी किसी रूपसि कम नहीं होती जो अपने अंग -प्रत्यंग की खुशबू दूसरे में बसा जीना दुश्वार कर देती है और कल्पनालोक के संसार में विचरण करने को मजबूर कर अपने को किसी राजकुमार से कम भास नहीं कराती ।
       कालेज से घर के रास्ते को लोटते हुए रवि की निगाह बरबस उस इमारत पर टिक जाती थी 

जो मुगलकाल में बनी थी , जहाँ रवि और साँझ का प्रथम प्रणय शुरू हुआ था । प्राय: होठों से बुदबुदाते हुए मुस्कराहट के साथ पुकार बैठता था “साँझ , तुम कहाँ हो, कब आओगी “पर साँझ की अनुपस्थिति में एक आवाज अन्तस से आती और गूँज उठती -“रवि ! रवि  ! 
          मैं यहीं तुम्हारे पास हूँ और हमेशा , हमेशा के लिए । 
             बस इन्तजार है उस दिन का जब तुम पढ़ाई पूरी करने के बाद मुझे अपनी दुल्हन बना हमेशा के लिए मुझे ले जाओगें । 
              साँझ भावुक को अपनी निजता को खोलने लगी , रवि , ” पता है पापा ने एक लड़का देखा लेकिन तुम को छोड़ और किसी को जिन्दगी भर को अपना कहना रवि !अब सम्भव नहीं ।

इतना सुनकर रवि कहता , “तुम अस्वीकार क्यों नहीं कर देती ” । इतना कहकर ऐसे टिप्स रवि  बताता कि साँझ का रिश्ता गैर से  कभी न जुड़ पाये । 
           हर रोज दोनों का मिलना जारी रहा , शाम के समय घूमते हुए रवि साँझ कीएक झलक पाने को आतुर रहता ।जब देख लेता तो दिल को सुकून मिल जाता और न देखने पर खोया – खोया सा रहता । पेम की खुमारी भी बड़ी तीव्रता से चढ़ती है ,कुछ नहीं सूझता उसके आगे । रोजमर्रा की दिनचर्या में के रंग – ढंग अहीब से हो जाते है , यहीं हाल रवि का था ‘ ।

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         रवि को बुझा – बुझा सा देखकर उसकी दोस्त हपिल पूछ ही बैठा “रवि ! क्या हुआ ? लेकिन रवि की चुप्पी से ही कपिल को अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था । तब कपिल ने कुछ पूछना आवश्यक नहीं समझा । 

 

      एक दिन साँझ आॅफीस से घर जाते हुए मिल गयी। रविदने उसका हाथ अपने हा थ में ले लिया और कहा , साँझ चलें , इस दुनियाँ से बहुत दूर । क्षण भर को प्रेमी मन साथ -साथ हो लिया लेकिन फोन की घंटी बतजते ही सँभल कर बोली , नहीं रवि , पापा का फोन है ऐसा कहकर रवि का हाथ झटकते हुए  चलने लगी , लेकिन रवि ने पुकारते हुए कहा , रूको जस्ट वन मिनट , मत जाओ साँझ , तुम मेरी हो ।
         जैसे परमपिता ने दोनों के बीच कोई कनेक्शन स्थापित कर रखा हो साँझ रूक गयी , रवि बात सुन रहा और एक बिजली सी चमक साँझ के अन्तर प्रकाशमान हो कहने लगी , साँझ ! बस तुम मेरी , केवल मेरी हो ।
डॉ मधु त्रिवेदी

अधीर सागर

​अधीर सागर

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लहरों ने किया श्रृंगार 

सागर मचलने लगा 

लहरों के दिल में क्या है 

देख सागर कहने लगा 
ऊँची इतनी उठती  

कब मिलोगी आ मुझमें 

जवानी उफन उफन गिर रही 

 कब करोगी आत्मसात मुझे
किनारों से टकरा -टकरा कर

हृदयतल  मेरा तोड़ डाला 

आशिकों की लाइन में ले 

जा मुझे खड़ा कर डाला
प्रिये रोज क्षीण करती हो मुझे

कैसा यह तेरा फसाना है

तोड़ मेरे तट को नित्य अब

कितना और तुम्हें  सताना है 
रोज आ समीप मेरे तुम 

दूर इतनी चली जाती हो

एक-टक निहारता रहता

आचमन ही मिल पाता है
शिकायत नहीं करता 

सौंगंध खा कहता हूँ  प्रिये

उठ कर समाना मुझमें तेरा

आह्लाद अनुपम दे जाता है
तेरे आ मिलने से ही प्रिये 

जीवन यह सार्थक लगता है 

तेरे बिन जीवन का क्या मोल 

हर पल पहाड़ सां लगता है 
डॉ मधु त्रिवेदी 

भिखारिन

​भिखारिन

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छुक छुक 

चलती रेल

जैसे जीवन रेल

चलती भिखारिन

दीन दशा ऐसी

कहती हो वैसी

अब मैं आम से 

आप कहलाऊगी
निर्भर दया पर

भाँति भाँति के मुसाफिर

जीवन की रेल

जाती किस ओर

पग पग माँगती 

देखती ऐसे

जैसे हो चोर

अभागिन भिखारिन
नहीं भिखारिन 

किसी की माँ भी 

राजनीति की पहचान

सभ्यता का आयना 

देश की माँ आहत 

उसकी क्या कहानी 

रोयेगी जो आँखें 

उसकी क्या जवानी

नया दौर

​नया दौर

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फैशन की दोड मे सब आगे है

शायद यहीं नया दौर है

मम्मी पापा है परम्परावादी 

मूल्यों की वे आधारशिला

वक्त ने बदला हैं उनको बेजोड़

पर मानस में है पुरानी सोच 

शायद यहीं नया दौड़ है 
भारतीय सभ्यता की है बेकद्री

पाश्चात्य सभ्यता को है ताली

पारलर सैलून खूब सजते

हजारों चेहरे यहाँ पूतते है

मेहनत के धन का दुरूपयोग है

बेबसियों का कैसा दौर है

शायद यहीं नया दौर है
बाला सुंदर सुंदर सजती है

मियाँ जी की कमाई बराबर करती है

टेन्शन खूब बढाती है

अपने को चाँद बना दिखलाती है

प्रिय प्राणेश्वर की दीवाणी है

हरदम न्यौछावर रहने वाली है

शायद यही नया दौर है
हिन्दी पर अंग्रेजी हावी है

भाषा बोलने में खराबी है

अंग्रेजी अपनी दासी है

हिन्दी कंजूसी सिखाती है

ना हम हिंदूस्तानी हैल
बाजार जब मैं जाती हूँ

मम्माओं को स्कर्ट शर्ट,जीन्स टॉप

पहना हुआ पाती हूँ

मम्मा बेटी में नहीं लगता अन्तर

बेटी से माँ का चेहरा

सुहाना है लगता 

शायद यहीं नया दौर है
अंग्रेजी पढना शान है

हिन्दी से हानि है

नयी पीढ़ी यहीं समझती है

इसलिये हिन्दी अंग्रेजी गड़बड़ाती

नौनिहालों का बुरा हाल है

माँ को मॉम कहक

पिता को डैड कहकर

हिन्दुस्तान का सत्यानाश है

शायद यहीं नया दौर है
बुजुर्ग वृद्धाश्रम की आन है

घर में नवविवाहिता का राज है

मर्द भी भूल गया पावन चरणों को

जिनकी छाया में में बना विशाल वट है

संस्कृति , मूल्यों का ह्रास हो रहा

पाश्चात्य रंग सभी पर निखर रहा

शायद यही नया दौर है
डॉ मधु त्रिवेदी 

आगरा

बौराया

​बौराया बादल

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मै पागल बौराया बादल हूँ.

करू छेडाखानी जा मेघों से.
कालिदास का बन मेघदूत.

प्रिया पास ले जाऊ सन्देश.
प्रेम निवेदन कमल चरणों मे.

पागल बसन्त की बयार हूँ मै.
डॉ मधु त्रिवेदी  

प्यार पाना है 

​प्यार पाना है तो

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प्यार अगर तुमको पाना है तो , गले लगाना सीखो

आपसी खींचातानी छोड़ , प्रेम को उगाना सीखो
हम सब एक ही खुदा के वंदे, साथ-साथ मिलकर रहते 

दुख- सुख में बन कर सहभागी , गम सबके हम हर लेते 
कभी पड़ोसी वार करे तो , सीख नेक तब  देते है 

जब छाती पर वो चढ़ आए , सिखा सबक देते है
गर फिर नजर उठायी तुमने , सीना छलनी कर देगें

अब तक की सब करतूतों का , हर करनी  हिसाब देगें
सदा -सदा से शाँतिदूत हम , शाँति का पाठ पढ़ाते है

जहर नफरत का घोल दे तो , सही राह उसे दिखाते है 
डॉ मधु त्रिवेदी  

दीवाली 

​दीवाली

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जब मनाओ दीवाली तुम

द्वेष , ईर्ष्या , नफरत जला देना

छोड़ चायना मेड उत्पाद 

देशी मन बसा लेना 
जब मनाओ दीवाली तुम

दीप माटी के जला लेना

 छोड़ पटाखे , आतिशबाजी

मन को रौशन कर लेना
जब मनाओ दीवाली तुम

घर में डटे कलुष मिटा देना

छोड़ रोज की तू – तू , मैं – मैं

प्यार का जहाँ बसा लेना 

जब मनाओ दीवाली तुम

राम की भावना मन सजा लेना

छोड़ इसका -उसका ,मेरा -तेरा

भाई-चारा बढ़ा लेना 
जब मनाओ दीवाली तुम 

पड़ोंसी को गले लगा लेना

हो गर पाक जैसा पड़ोसी

राकेट में लगा उड़ा देना
जब मनाओ दीवाली तुम

खूब मिलकर मौज मनाना

हो गर चायना जैसा फरेवी

पूर्ण बहिष्कार कर देना
जब मनाओ दीवाली तुम

सिय- राम सा साथ निभाना

छोड़ पर नारी, स्वभार्या को

प्रीत के रंग सजा लेना
जब मनाओ दीवाली तुम

माँ की हर आज्ञा मान लेना

छोड़ न वृद्धाश्रम में उनको 

पग धूल सिर लगा लेना
डॉ मधु त्रिवेदी