देखो प्रिये !
मास चैत्र चला आया ,ताप सूर्य का दग्धाने लगा

सूखे सरोवर औ तालाब ,खग पंछी लगे अकुलाने 

ताँक -झाँक करे वारि की ,दाने -दाने को सब तरसे

चाँद 

आ गया आसमा में ,चाँदनी शीतलता देने  लगी

नये पात पल्लव आये ,शिशिर परिधान उतरने लगे 

संध्या वेला जब आती है ,अहसास सुखद लाती है 

रमणीयता बढ़ जाती , अंग -अंग महक चहकते है 

सांध्य 

सुन्दरी नाच उठती , कलरव पंछी की गूज उठती 

अवनि का ताप बढ़ता , तन -मन का काम जगता 

बांके नयनों चल उठते , तीर मन्मथ से निकलते 

निशा 

सुन्दरी बादल पनघट, उतर आये भरने को सुधा 

चूम -चूम निशा घन छितराये , मिलन हुंकार भरे

तारे देख मन्द मुस्कराये ,नैन कटाक्ष की चोट ऐसी 

उर 

छलनी सुराओं का हो जाये, विलासिता की दुर्ग टूटे

प्रेमी जन आकुल हो जाते ,देख चैत्र मास तेरा प्रताप 

हर ओर तालाब कूप खुदते , प्याऊँ लग जाते है

मन्द 

बयार कब चले अब , पात कब हिले लोग तकते

तृषा भी जल उठती है , भीम पराक्रम दिखा उठती

प्रवासी प्रियतम के उर में ,शोले भड़का उठती है
डॉ मधु त्रिवेदी 

☀☀      अंधेर नगरी , चौपट ———–   ✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍       सोन चिड़िया कहलाने वाला मेरा देश भारत समय -समय पर आक्रमणकारियों के द्वारा लूटा जाता । हमारी विवश्ता कि हम अपने को लुटवाते रहे । महमूद गजनवी से लेकर मुगल सल्तनत के नष्ट होने तक भारत की अपार सम्पदा , धरोहर एवं संस्कृति को लूटा जाता रहा ।           रामकृष्ण , विश्वामित्र , वशिष्ठ , अपाला गार्गी आदि विद्वतजनों की यह भूमि , यदि वर्तमान पर दृष्टिपात करे, तो ‘अंधेर नगरी के सिवा कुछ और नजर नही आती । स्वार्थ लिप्सा में लिप्त हम किसी के मान सम्मान की हत्या करने में जरा भी चूक नहीं करते है , मान – सम्मान को छोड़ इंसान की भी हत्या कर देते है महत्वाकांक्षा की पूर्ति में उतावले हम उस अंधे धृतराष्ट्र तथा आप उस दुर्योधन की  की भाँति है है जो पूरे कुल का विनाशक है ।          हर युगीन परिस्थितियाँ बदलती है जिस समय भारतेन्दु के इस नाटक की रचना हुई तब से आज तक परिस्थितियों में अन्तर आया है । अंधेर नगरी तो हर युग में मौजूद रही , बस उसका स्वरूप बदला है । भ्रष्टाचार , सत्ता की जड़ता , अन्याय पर आधारित व्यवस्था जो किसी मूल्य की नहीं है । यह तो हर युग की विशेषता रही है । जिस राज्य में विवेक – अविवेक का भेद  नहीं होता उस राज्य में प्रजा कैसे सुखी रह सकती है ? क्योंकि भ्रष्टाचार व्यवस्था की आत्मा में गहराई से समाया हुआ है और बड़े – बड़े चोर सरेआम घूमते रहते है ।                   महत्वाकांक्षा की पूर्ति मेंआमादा हम उस शिष्य की के सदृश है जो भारतेन्दु के नाटक ” अंधेर नगरी ” में अपने गुरू को छोड़ अय्याशी जीवन व्यतीत करने के लिए अंधेर नगरी रूक जाता है । जहाँ पर हर चीज का भाव ‘ टका सेर ‘ पाता है । टका सेर से मेरा आशय वोटों को बटोरने की राजनीति की आड़ में एवं वर्गगत समानता की आड़ में सत्तापक्ष द्वारा चली गयी कूटनीति चालों से है , ये कूटनीतिक चालें आरक्षण एवं सामाजिक समानता के नाम पर लोगों से छल कर रही है ।                   “रिश्वत की संस्कृति ” सरकारी और गैर सरकारी महकमे में पूरे प्रभाव के साथ जीवित है जो घोटालों का ही सुधरा रूप है कहीं भी किसी भी डिपार्टमेंट में छोटे से छोटा , बड़े से बडा काम बिना रिश्वत नही होता । सत्ता में कोई भी आये , सभी जनता का खून चूसते है जनता को इन्तजार रहता है कि कोई उद्वारक आयेगा और युगों से चली आ रही व्यवस्था में सुधार होगा । जिसके कर्मों से कुशासन रूपी अंधा राजा फाँसी पर लटकेगा ।और सुशासन रूपी चेला (शिष्य ) दूसरे शब्दों में जनता या देशवासियों को मुक्ति मिलेगी ।                        यहीं हालात न्यायलयों की है “जिसकी लाठी , उसकी भैंस “। न्याय उसी को मिलेगा जिसकी लाठी में दम है । काफी लम्बी प्रक्रिया के बाद अपराधी साफ बच जाता है निर्दोष को ही सजा मिलती है और गरीब तारीख पर तारीख लेते – लेते या तो मर जाता है या सुसाइड कर लेता है ।                    ‘अंधेर नगरी की ” यहीं प्रासंगिकता है कि दुनियाँ के किसी भी देश की बदलती शासन की परम्परा का लम्बा इतिहास “अंधेर नगरी ” से स्वत: जुड़ जाता है । “अंधेर नगरी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रजातंन्त्र की घोर असफलताओं और व्यवस्थाओं के पतन का प्रतीक है । डॉ मधु त्रिवेदी @कापीराइट@

दोस्ती 

दोस्ती 
सांस- सांस पिरो कर

जो ताना बाना बुना था

आज यदि भेट कर दूँ 

को कम है 
यह जन्म छोड बार – बार

जन्म लेने पड़े तो सब

भेंट स्वरूप तुझको मैं 

अर्पित कर दूँ
साँस तो फिर मिल जायेगी 

मगर हर जन्म में तू हो 

या न हो इसलिये 

मित्र हर पल हर क्षण
आज मेरा प्रण मेरा जतन 

अपनी साँस मात्र देने का

जीवन उत्सर्ग करने का है 

बार – बार अपने को 
मैं खुश हूँ आज 

मेरी देह जो मात्र ख्वाहिशों 

का पुलन्दा है 

बस तेरी साँस में बसेगी
धन्य हूँ मैं धन्य हूँ दोस्त

रूह बन पास तेरे 

आती रहूँगी 

और धूल बन कदमों 

तले आती रहूँगी
डॉ मधु त्रिवेदी

रोज डे अपना मनाती शायरी

​रोज डे अपना मनाती शायरी

साथ तेरा फिर मिलाती शायरी
पास मुझको जब बुलाता रोज तू

भाव सुंदर तब जगाती शायरी
बात दिल मेरा कहे जब आपसे 

आह में तेरी समाती शायरी
जब मुझे प्रपोज करता वो तभी

 प्यार भंगिमा से सजाती शायरी
वीक वैलेंटा मना कर यहाँ

 जिन्दगी को राह लाती शायरी
प्रेम हो जाये किसी से जब कभी

रात में नींदें उड़ाती शायरी
हो गये पागल इश्क में अब सभी 

तब सदा खुद को भुलाती शायरी
जब नजर से मिल नजर हो एक तब

आशिकों को यूँ सताती शायरी
बेवफा जब आपसे कोई करे

मौत युगलों को दिलाती शायरी

फूल

​फूल में तेरे लिए हर रोज लाया हूँ

 प्यार में तेरे  दिवाना मैं बनाया हूँ
खूबसूरत तू बहुत है इसलिये तो मैं 

प्रान की बाजी लगा कर आज आया हूँ
आग ऐसी आज दिल में जो लगाई है

छोड़ कर मैं यह जमाना कुँवारा हूँ
जब न भायेगा इश्क तेरा किसी को तब

जुल्म दुनियाँ के सभी मैं आज सहता हूँ
मेहबूबा की अदा अब हो गयी ऐसी

आज उसका मैं सदा को ही नजारा हूँ

     करिए❤❤❤❤❤आह में मेरी समाया करिए           रोज हर अंजन लगाया करिएहोठ पर मेरे मुस्करा कर तुम            चाँद बन मुझको सजाया करिएबन मोहन सपनों में आया करिए            नीदें मेरी सलोनी बनाया करिएमुरली मधुर – मधुर मंद बजा कर             रग- रग मेरी रास मचाया करिएविकल हिरदय का बन जा तू साज       सभल कर रह न भूल जा तू आजतब तक ही रख तू अपनी देह का मोह        जब तक न जाये तेरी यह लाजजीवन वही कहलाता खास         दुख दरद में कोई हो पासचलता गया जो अपने पैर         वह बुढापा बस आये रासडॉ मधु त्रिवेदी 

गजल

तू हवा है तेरी मैं हिफाजत नहीं कर पाऊँगा
      तू चली छोड़  मैं रूखसत नही कर पाऊँगा
जिन्दगी में है ओर भी चाह रखने वाले मुझसे

       आपसे मुहब्बत की  हिमाकत नही कर पाऊँगा
जो सजी हो डोली तेरी दूसरे जहाँ जाने के लिए

        साथ निभाने की पूरी हसरत नहीं कर पाऊँगा
खूब इज्जत बख्शी पूरा करने को ख्वाहिश

        तेरी खुशी की मैं खिलाफत नही कर पाऊँगा
तू खिला हुआ गुलदस्ता है अपने इस चमन का

       बागवाँ से तोड़ने की मैं शरारत नही कर पाऊँगा
एक नया जहाँ बसायेंगी तू यहाँ से हो विदा

        मैं तेरे लिए हुस्न की इबादत नही कर पाऊँगा
याद आयेगी लोट आने की बाबुल के घर जब

         तुझको ना लाने की वकालत नहीं कर पाऊँगा

डॉ मधु त्रिवेदी